चलते रहना रुकना नहीं

चलते रहना रुकना नहीं
मुसाफिर हूँ आखिर ठहेरना नहीं
सफ़र के हर मोड़ पर
थकावट महसूस होती अक्सर
कभी यूहीं रुक जाता
थोड़ी देर विश्राम करता
यह बात कभी भूलता नहीं
चलते रहना रुकना नहीं…
मंज़िल अभी पहुंचा नहीं
कितनी दूर अभी खबर नहीं
होश तो बस इसका है की
चलते रहना रुकना नहीं…
पत्थर कंक्कर रास्ते पर
और अँधेरी रात का डर
डट कर चलता रहता हूँ
ध्यान इस बात का रखता हूँ
चलते रहना रुकना नहीं…
सुना किसी फ़क़ीर की बात
रब की तलाश में चलो साथ
मंज़िल का कोई पता नहीं
चलते रहना रुकना नहीं…
क्या कभी मंजिल मिलेगी भी
यह भी अभी पता नहीं
निकट है या दूर अभी
यह भी अभी पता नहीं
सिर्फ जान लिया है एक बात
चलते रहना रुकना नहीं…
सुन्दर सुन्दर दृश्य यहाँ
लगता है रुक जाऊं यहीं
थोडा विश्राम कर जाऊं यही
आराम के कुछ पल निकालू
और थोड़ी देर ठहेर जाऊं यहीं
मंजिल अब लगती है दूर
और चलना है कितनी दूर
क्या मैं पहुँच पाउँगा या नहीं
मन में उठती यह संशय नयी
और जब दिन हुए तीन चार
तो दिल से उट्ठी चीक एक बार
चलते रहना रुकना नहीं…
जल्दी से उठकर लगा चलने
कैसे फसा दिया माया ने
कैसे उलझ गया मैं इस में
ऐसे कैसे भूल गया मैं
कैसे मुझे याद रहा नहीं
चलते रहना रुकना नहीं…
रब का द्वार नहीं था दूर
मेरी आँखों में फसा था धूल
जब दिल से उठी तड़प की चीख
और अश्रु से हुए गीले आँख
उठ गयी माया की वेल
ख़तम होगया सारा खेल
साफ़ दिखाई अब दिया मुझे
रब था यहीं अहसास हुआ मुझे
अब ना कोई रास्ता था
ना कोई मंज़िल थी
अब चलना तो नहीं था
रुकना और ठहेरना था
कहाँ भटकता रहा मैं रे
जब रब था भीतर ही मेरे…
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